पुरानी किताब रहस्यमयी किताब

विजय हमेशा से पुरानी किताबों का शौकीन था। पुराने काग़ज़ों से आती एक अलग ही महक होती है, जो उसे अपनी ओर खींचती थी। एक दिन, शहर के पुराने बाज़ार में एक छोटी-सी किताबों की दुकान पर, उसकी नज़र एक अजीब-सी पुरानी किताब पर पड़ी। किताब की चमड़े की जिल्द पर धूल जमी थी और उसके कोनों से कागज़ झांक रहे थे। उस पर कोई नाम नहीं था, सिर्फ़ एक ही लाइन लिखी थी: “पुरानी किताब का राज़।”

विजय के दिल में अजीब-सी हलचल मची। ऐसा लगा, जैसे ये किताब उसे बुला रही हो। उसने किताब उठाई और दुकानदार से पूछा, “यह किताब कितने की है?”

दुकान के मालिक ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज तक किसी ने भी यह किताब नहीं खरीदी है।” इसे खरीदने के लिए आपको इसे पढ़ने के बाद वापस करना होगा।

विजय को यह शर्त थोड़ी अजीब लगी, लेकिन वह किताब ख़रीदने के लिए तैयार था। उसे लगता था कि किताब में जरूर कुछ अनोखा होगा। दुकानदार की बात सुनकर विजय ने बिना कुछ कहे किताब उठा ली और घर लौट आया। वह उस किताब में छुपे हुए रहस्य को जानने के लिए बेचैन हो गया।

रात को विजय ने धीरे-धीरे किताब के पन्ने पलटने शुरू किए। हर पन्ने पर अलग-अलग कहानियाँ थीं—कुछ रहस्यमयी, कुछ डरावनी। जैसे ही वह एक खास पन्ने पर पहुँचा, उस पर लिखा था: “जो भी यह किताब पढ़ेगा, उसे इसके रहस्यों का सामना करना पड़ेगा। यह है पुरानी किताब का राज़।”

यह वाक्य विजय के दिमाग में घूमने लगा। आखिरकार यह किताब क्या छुपा रही थी? उसने पढ़ना जारी रखा।

अगले कुछ पन्नों पर एक खजाने का ज़िक्र था। किताब में लिखा था कि एक पुराने महल के नीचे एक गुप्त कक्ष में एक अमूल्य खजाना छिपा हुआ है। लेकिन उस खजाने तक पहुँचने के लिए कुछ कठिन चुनौतियाँ पार करनी होंगी। विजय को लगा कि यह सिर्फ एक कहानी है, लेकिन फिर भी, उसके भीतर एक अजीब-सी जिज्ञासा जागी।

अगली सुबह, विजय किताब को लेकर अपने दोस्त मोहित के पास पहुँचा। उसने उसे किताब दिखाई और कहा, “मुझे लगता है कि यह किताब सच में कुछ छुपा रही है। यह शायद किसी खजाने का रास्ता बता रही है।”

मोहित ने किताब को गौर से देखा और कहा, “तू पागल है! पुरानी किताब का राज़… यह सब बस कहानी है। लेकिन अगर सच में ऐसा कुछ है, तो हमें इसे ज़रूर आज़माना चाहिए।”

विजय और मोहित ने किताब में दिए गए निर्देशों का अनुसरण करने का निश्चय किया। किताब के अनुसार, उन्हें शहर से बाहर एक पुराने किले में जाना था। वह किला अब वीरान था और वहां कोई नहीं जाता था। दोनों दोस्त उस वीरान किले तक पहुँच गए।

किले के भीतर का दृश्य भयावह था। जर्जर दीवारें, टूटी खिड़कियाँ, और चारों ओर घना अंधेरा था। किताब के अनुसार, किले के नीचे एक गुप्त मार्ग था जो खजाने तक पहुँचता था। विजय ने किताब के पन्ने पर उँगली फिराते हुए कहा, “यही है पुरानी किताब का राज़!”

वे दोनों उस गुप्त मार्ग की तलाश में लगे रहे और कुछ समय बाद, उन्हें एक गुप्त दरवाजा दिखा। दरवाजे के ऊपर वही शब्द उकेरे हुए थे: “पुरानी किताब का राज़”। विजय का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसने धीरे से दरवाजे को खोला और दोनों भीतर दाखिल हो गए।

अंदर एक लंबा अंधेरा गलियारा था, जो एक बड़ी गुफा की ओर जा रहा था। विजय ने मोहित की ओर देखा और कहा, “यहाँ तक आ गए हैं, अब पीछे नहीं हट सकते। यह पुरानी किताब का राज़ है, और हमें इसे जानना ही होगा।”

उन्होंने गुफा में कदम रखा, और तभी उन्हें महसूस हुआ कि वहाँ कुछ अदृश्य ताकतें थीं। जैसे ही वे आगे बढ़े, उन्हें चारों ओर से सरसराहट की आवाज़ें आने लगीं। हर कदम पर उनके रास्ते में नई चुनौतियाँ आती रहीं। कुछ जगहों पर पथरीले पत्थर, कहीं उधड़ी हुई दीवारें और कहीं तीरों से बने खतरनाक जाल बिछे थे।

हर चुनौती के बाद विजय का विश्वास और बढ़ता जा रहा था कि किताब की बातें सच हैं। उसने मोहित से कहा, “देखा, मैंने कहा था ना? यह सब वही है, जो पुरानी किताब का राज़ हमें दिखाना चाहती थी।”

आखिरकार, कई घंटे के संघर्ष के बाद, वे एक बड़े हॉल में पहुँचे। हॉल के बीचों-बीच एक चमचमाती हुई तिजोरी रखी थी, और उस पर लिखा था: “पुरानी किताब का राज़।”

विजय ने धीरे से तिजोरी का ढक्कन उठाया। अंदर सोने और चांदी के सिक्के, बहुमूल्य रत्न, और कई पुरानी धरोहरें थीं। दोनों दोस्त इस खजाने को देख कर हैरान रह गए। विजय ने किताब को उठाकर तिजोरी के पास रख दिया और कहा, “तो यही है पुरानी किताब का राज़।”

लेकिन जैसे ही विजय ने खजाने में से एक सिक्का उठाया, पूरे हॉल में एक तेज़ हवा चली और अचानक वहाँ अजीब-सी आवाज़ें गूंजने लगीं। ऐसा लगा मानो किसी ने उन पर हमला कर दिया हो। विजय और मोहित घबराकर पीछे हटे। तभी किताब के एक पन्ने पर उभर कर आया: “यह खजाना सिर्फ़ उनकी अमानत है जो इसका राज़ संभाल सके।”

विजय ने महसूस किया कि यह खजाना उनके लिए नहीं था। उसने धीरे से सिक्का वापस तिजोरी में रख दिया और मोहित से कहा, “हमें इसे यहीं छोड़ देना चाहिए। यह खजाना हमारा नहीं है। यही है पुरानी किताब का राज़।”

दोनों ने खजाने को वैसे ही छोड़ दिया और किताब को बंद कर दिया। उन्होंने गुफा से बाहर निकलने का रास्ता पकड़ा। जैसे ही वे किले के बाहर पहुँचे, किले का दरवाजा अपने-आप बंद हो गया और उन पर जैसे किसी अदृश्य शक्ति का बोझ कम हो गया।

विजय ने मोहित से कहा, “शायद यही सबक था। कुछ राज़ सिर्फ़ जानने के लिए होते हैं, अपने पास रखने के लिए नहीं। यही है पुरानी किताब का राज़।”

इस घटना के बाद, विजय ने वह किताब उसी दुकान पर लौटाकर रख दी, जहाँ से उसने उसे लिया था। जाते-जाते उसने दुकानदार से कहा, “अब मुझे समझ में आया कि यह किताब यहाँ क्यों रखी है। हर किसी के लिए कुछ रहस्य जानना जरूरी नहीं होता। यही है इस पुरानी किताब का राज़।”

sunsire

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